अक्सर रेगिस्तान को वीरान और बेजान माना जाता है, लेकिन बीकानेर के पास स्थित जोड़बीड़ इस सोच को पूरी तरह बदल देता है। हर साल 5 जनवरी को मनाए जाने वाले ‘नेशनल बर्ड डे’ के आसपास यहां का नजारा देखते ही बनता है। जोड़बीड़ का आसमान हजारों परिंदों की चहचहाहट, उड़ानों और रंगों से जीवंत हो उठता है। यह जगह केवल एक जलाशय नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन को संजोए रखने वाली एक जीवित प्रयोगशाला है, जहां विलुप्त होती पक्षी प्रजातियां खुद को सुरक्षित महसूस करती हैं।
जब साइबेरिया, मंगोलिया और कजाकिस्तान जैसे देशों में कड़ाके की सर्दी जीवन को रोक देती है, तब ये प्रवासी पक्षी हजारों किलोमीटर का सफर तय कर जोड़बीड़ पहुंचते हैं। फ्लेमिंगो, क्रेन और कई तरह के जलपक्षी यहां के शांत और अनुकूल वातावरण में अपना अस्थायी बसेरा बनाते हैं। इनकी मौजूदगी यह संदेश देती है कि यदि संरक्षण और सुरक्षा मिले, तो मरुस्थल के बीच भी जीवन पूरी भव्यता के साथ पनप सकता है।

जोड़बीड़ की सबसे बड़ी पहचान इसका वल्चर संरक्षण क्षेत्र होना है। एक समय विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके गिद्ध आज यहां सुरक्षित लौट रहे हैं। लॉन्ग-बिल्ड वल्चर, व्हाइट-रम्प्ड वल्चर और इजिप्शियन वल्चर की अच्छी संख्या यहां देखी जाती है। ये गिद्ध प्रकृति के सफाईकर्मी हैं, जो मृत अवशेषों को हटाकर बीमारियों के फैलाव को रोकते हैं। इसी वजह से जोड़बीड़ को भारत के प्रमुख वल्चर हैबिटैट्स में गिना जाता है।

गिद्धों के साथ-साथ जोड़बीड़ का खुला मैदान स्टेपी ईगल, इम्पीरियल ईगल और गोल्डन ईगल जैसे शक्तिशाली शिकारी पक्षियों का भी घर है। ये पक्षी चूहों और अन्य छोटे जीवों की संख्या नियंत्रित कर किसानों के मित्र और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के रक्षक बनते हैं।
हालांकि, इतनी प्राकृतिक समृद्धि के बावजूद जोड़बीड़ कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। बढ़ता प्रदूषण पक्षियों के स्वास्थ्य पर असर डाल रहा है, जबकि शोर और अतिक्रमण से उनका प्राकृतिक आवास लगातार सिमटता जा रहा है। इसके अलावा आवारा कुत्ते ज़मीनी पक्षियों और उनके घोंसलों के लिए बड़ा खतरा बने हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जोड़बीड़ का संरक्षण केवल सरकारी फाइलों या योजनाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है कि इस अनमोल पक्षी-आश्रय को सुरक्षित रखें, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी रेगिस्तान के बीच परिंदों की इस अनोखी दुनिया को देख सकें।
